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NEW DELHI: सनातन धर्म में LEATHER की चीजें प्रयोग करना साफ़ मना है। असल में LEATHER का उपयोग INDIAN ने कभी किया ही नहीं था। INDIA में सदियों से ही कपड़े की बनी चीजों का इस्तेमाल होता आया है। अब सवाल ये है कि INDIA में LEATHER आया कहां।

मध्यकालीन हिन्दुस्तान में जब MUSLIM भारत में आये तो वह लोग भारत के अन्दर LEATHER लेकर आये थे। बाद में भारत में आने के बाद कई स्वाभिमानी जातियों को नीचा दिखाने के लिए और जब कई जातियों ने इस्लाम स्वीकार नहीं किया गया तो इन जातियों से मरे पशुओं की खाल उतरवाकर, चमड़ा बनवाया गया था। खासकर गोचर्म को इस्लाम में परोक्ष रूप से महत्वपूर्ण माना गया है। सवाल आज के मुसलमान का नहीं है। क्योकि बुरे तो वो मुस्लिम थे जो विदेशी थे और इन्होनें ही भारत को बाँटने के लिए चमड़े और खासकर गाय के चमड़े पर जोर दिया था।

बगदाद के खलीफा ने अपने सेनापति मुहम्मद बिन कासिम को बैल की खाल में भरकर तीन दिनों तक कठोर यातना दी थी। आप कोई सनातन शास्त्र पढ़ लीजिये और इस तरह की सजा खोजिए। सनातन में पशु की खाल और उसके उपयोग जैसी चीजें मौजूद नहीं हैं। यह खाल और चमड़ा जैसी चीजें विदेशी मुसलमान भारत में लाये थे। मंदिरों को लुटने के लिए मंदिर के अन्दर गाय के खून को छिड़का जाता था. इस कार्य से हिन्दुओं की भावना को चोट पहुँचती थी। हिन्दुओं की आस्था पर ही चोट पहुंचाने के लिए गाय की खाल को उतारकर चमड़ा बनाया जाता था। प्रारंभ में कोई भी हिन्दू चमड़े का उपयोग नहीं करता था।

आप आज से कुछ 10 साल पहले चलें तो आपको याद आएगा कि आपके माता-पिता या दादा-दादी चमड़े के सामान आपको इस्तेमाल करने से मना करते होंगे। असल में पशुओं की हत्या करके ही या मरे पशुओं की खाल से चमड़ा बनता है और इसी का उपयोग हिन्दू बड़े शान के साथ करते हैं।

अच्छा आपने कभी यह सोचा है कि एक खास जानवर की खाल से चमड़ा क्यों नहीं बनाया जाता है? वह जानवर एक धर्म में हराम है. तो क्या उसकी खाल से चमड़ा क्या बन नहीं सकता है?

इसका जवाब यही है कि विदेशी MUSLIM ने उस जानवर को हाथ ही नहीं लगाया था। खासकर बात हो INDIAN की तो भारत में मरे पशु की SKIN से कभी कुछ नहीं बनाया गया था। यह LEATHER HINDU धर्म की चीज ही नहीं है। लेकिन जानकारी के अभाव में आज LEATHER की चीजें HINDU लोग बड़े गर्व के साथ इस्तेमाल कर रहे हैं।

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